मेरा चेहरा एक शख्स से काफी मिलता है
मगर वो शख्स दिन में सैकड़ो बार बदलता है
कभी कुछ पग आगे, कभी उलट रखता है
कभी निर्भीक खड़ा घोर वर्षा में नहाता है
कभी मंद घटाओं को देख ही राह से मुड़ जाता है
नित्य नए इरादे बनता है, स्वपन् सजाता है
और मंजिल को राहों में उलझा हुआ पाता है
फिर इरादो के खंडहर में घूम घूम रह जाता है
वो शख्स दिन में सैकड़ो बार बदलता है
बदलता वह स्वयं ही है, परन्तु,
दूसरों को बदला हुआ बताता है
अंतःकरण के छोर ढूढ़ता रह जाता है
मन की संकरी गलियां बहुत कुछ लील जाती हैं
हर पल उसका एक बदला हुआ रूप लेकर आती है
कभी वो हँसता है, कभी मात्र मुस्कुराता है
कभी व्यथा सागर में डूबता उतराता है
बदले मनोभावो से, चेहरा तक बदल जाता है
वो शख्स दिन में सैकड़ो बार बदलता है
कभी प्रेम तो कभी प्रेमालाप करता है
कभी कठिनाइयों से लड़ता है और झगड़ता है
कभी ईर्ष्या, कभी क्रोध, कभी दृढ़ता है
कभी झूठा आवेश है, कहीं मंजिल से भेंट है
उस शख्स का हर भाव, अभाव का परिचायक है
ईच्छा, अभाव उसके अंतःकरण के नायक हैं
वो शख्स रंगमंच के हर किरदार को निभाता है
कभी कुछ तो कभी कुछ और बन कर आता है
वो शख्स दिन में सैकड़ो बार बदलता है
वो छलिया ही, स्वयं को की छलता है
अपनी हर एक विजय पर उछलता है
अपनी पराजय पर, नए बहाने गड़ता है
सोचता कुछ और है, होता कुछ और ही है
मन निरंकुश हर पल बदलत रहता है
वो शख्स दिन में सैकड़ो बार बदलता है
पर बड़ी विचित्र मेरी व्यथा है ;
उस चेहरे के अनेको शख्स है -
हर पल, मेरे साथ ही रहते हैं
उठते, बैठते, संग खाते, संग सोते हैं
वह सब एक दूसरों के पूरक हैं
फिर भी आपस में उलझ उलझ रह जाते है
उस शख़्स की शख्शियत को और विषम बनाते है
मगर वो शख्स दिन में सैकड़ो बार बदलता है
कभी कुछ पग आगे, कभी उलट रखता है
कभी निर्भीक खड़ा घोर वर्षा में नहाता है
कभी मंद घटाओं को देख ही राह से मुड़ जाता है
नित्य नए इरादे बनता है, स्वपन् सजाता है
और मंजिल को राहों में उलझा हुआ पाता है
फिर इरादो के खंडहर में घूम घूम रह जाता है
वो शख्स दिन में सैकड़ो बार बदलता है
बदलता वह स्वयं ही है, परन्तु,
दूसरों को बदला हुआ बताता है
अंतःकरण के छोर ढूढ़ता रह जाता है
मन की संकरी गलियां बहुत कुछ लील जाती हैं
हर पल उसका एक बदला हुआ रूप लेकर आती है
कभी वो हँसता है, कभी मात्र मुस्कुराता है
कभी व्यथा सागर में डूबता उतराता है
बदले मनोभावो से, चेहरा तक बदल जाता है
वो शख्स दिन में सैकड़ो बार बदलता है
कभी प्रेम तो कभी प्रेमालाप करता है
कभी कठिनाइयों से लड़ता है और झगड़ता है
कभी ईर्ष्या, कभी क्रोध, कभी दृढ़ता है
कभी झूठा आवेश है, कहीं मंजिल से भेंट है
उस शख्स का हर भाव, अभाव का परिचायक है
ईच्छा, अभाव उसके अंतःकरण के नायक हैं
वो शख्स रंगमंच के हर किरदार को निभाता है
कभी कुछ तो कभी कुछ और बन कर आता है
वो शख्स दिन में सैकड़ो बार बदलता है
वो छलिया ही, स्वयं को की छलता है
अपनी हर एक विजय पर उछलता है
अपनी पराजय पर, नए बहाने गड़ता है
सोचता कुछ और है, होता कुछ और ही है
मन निरंकुश हर पल बदलत रहता है
वो शख्स दिन में सैकड़ो बार बदलता है
पर बड़ी विचित्र मेरी व्यथा है ;
उस चेहरे के अनेको शख्स है -
हर पल, मेरे साथ ही रहते हैं
उठते, बैठते, संग खाते, संग सोते हैं
वह सब एक दूसरों के पूरक हैं
फिर भी आपस में उलझ उलझ रह जाते है
उस शख़्स की शख्शियत को और विषम बनाते है
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