जल्कुम्भियां तालाब में होकर भी,
तालाब का रंग नहीं हुआ करती है,
उसी पानी में होकर भी
उस पानी से अलग हैं, जुदा हैं ।
वो देखने में हरी होती हैं
उसमे नीले नीले फूल भी आते हैं
पर वो पानी का अक्स नहीं हुआ करतीं ।
लोग जल्कुम्भियों को देखते हैं,
नीचे ढके सैलाब को नही,
न मालूम कितनी गहराई है,
कितना जीवन भरा है उसमे,
कौन - कौन सी तरंगे उठकर,
यों ही उस आवरण में खो जाती हैँ
शायद ही कभी कोई दिखाई पड़े
जयादातर, अक्सर उसी में दफन हो जाती हैं ।
पर जल्कुम्भिया उस तालाब की पहचान हैं
लोग, उसे इसी झूठेपन से पहचानते हैं,
इसी झूठ को ही, तालाब का शिया मानते हैं,
कहते हैं, देखा हैं जल्कुम्भियों वाला तालाब;
गहरायी गुम हो गई, आवरण में अपने आप ।
उस तालाब की दशा भी असमंजस भरी हैं,
कभी उसे अपनी इस पहचान पर ख़ुशी है,
कभी इच्छा होती है, कोई उसे भी कुरेदे,
उसके अंदर झांके, और वृहद्ता को देखे,
ये जाने की तालाब शांत होकर, भी शांत नहीं है ।
कभी वो डरता है, कोई उसकी -
गन्दगी, मैलेपन पर नजर न डाल दे,
उसे बुरा, गन्दा समझ जुदा न कर दे,
वो डरता है, कि उसकी कितनी बदनामी होगी,
उफ्फ कितनी भयावह परेशानी होगी ।
इसी दर से वह, कभी भी इन-
जल्कुम्भियों को डूबने नहीं देता है
वह इन्हे पालता है, जिन्दा रखता है
अपनी ही असलियत की कीमत पर,
क्या करे गन्दा होकर भी, गन्दगी स डरता है ।
कभी खुद ही सोचता है, खुद से कहता है
कहीं ठहरे पानी में भी लहर उठा करती है
लहरें तो समंदर और दरिया में हुआ करती हैं
और तालाब कोई समंदर, कोई दरिया तो नहीं ।
दरिआ और समंदर में अनेकोनेक लहरें हैं
कितनी लहरें उठती हैं, गिरती हैं -
एक दूसरे में गुम होकर रह जाती हैं
पर तालाब, हाँ एक कंकड़ तो फेंको
देखो जल्कुम्भियां कैसे हिलती हैं
ऊपर, नीचे कैसे होती जाती हैं
लहर तो है, पर वो दिखाई नहीं पड़ती
कभी कभी कंकड़ की आवाज भी सुनाई नहीं पड़ती,
पर असर तो है, एक कशिश सी है, इस बंधन में
एक पत्थर जोर से उछाल कर देखो मित्रों,
देखो, पानी ऊपर तक छलक आएगा
जानते हो ऐसा क्यों, होता है ये या होगा?
क्यूंकि तालाब शांत है, ठहरा है ,
एक बार इन जल्कुम्भियों को तो हटाओ
तुम खुद जान जाओगे कि, यह कितना गहरा है ।
19 Feb, 2005
उसमे नीले नीले फूल भी आते हैं
पर वो पानी का अक्स नहीं हुआ करतीं ।
लोग जल्कुम्भियों को देखते हैं,
नीचे ढके सैलाब को नही,
न मालूम कितनी गहराई है,
कितना जीवन भरा है उसमे,
कौन - कौन सी तरंगे उठकर,
यों ही उस आवरण में खो जाती हैँ
शायद ही कभी कोई दिखाई पड़े
जयादातर, अक्सर उसी में दफन हो जाती हैं ।
पर जल्कुम्भिया उस तालाब की पहचान हैं
लोग, उसे इसी झूठेपन से पहचानते हैं,
इसी झूठ को ही, तालाब का शिया मानते हैं,
कहते हैं, देखा हैं जल्कुम्भियों वाला तालाब;
गहरायी गुम हो गई, आवरण में अपने आप ।
उस तालाब की दशा भी असमंजस भरी हैं,
कभी उसे अपनी इस पहचान पर ख़ुशी है,
कभी इच्छा होती है, कोई उसे भी कुरेदे,
उसके अंदर झांके, और वृहद्ता को देखे,
ये जाने की तालाब शांत होकर, भी शांत नहीं है ।
कभी वो डरता है, कोई उसकी -
गन्दगी, मैलेपन पर नजर न डाल दे,
उसे बुरा, गन्दा समझ जुदा न कर दे,
वो डरता है, कि उसकी कितनी बदनामी होगी,
उफ्फ कितनी भयावह परेशानी होगी ।
इसी दर से वह, कभी भी इन-
जल्कुम्भियों को डूबने नहीं देता है
वह इन्हे पालता है, जिन्दा रखता है
अपनी ही असलियत की कीमत पर,
क्या करे गन्दा होकर भी, गन्दगी स डरता है ।
कभी खुद ही सोचता है, खुद से कहता है
कहीं ठहरे पानी में भी लहर उठा करती है
लहरें तो समंदर और दरिया में हुआ करती हैं
और तालाब कोई समंदर, कोई दरिया तो नहीं ।
दरिआ और समंदर में अनेकोनेक लहरें हैं
कितनी लहरें उठती हैं, गिरती हैं -
एक दूसरे में गुम होकर रह जाती हैं
पर तालाब, हाँ एक कंकड़ तो फेंको
देखो जल्कुम्भियां कैसे हिलती हैं
ऊपर, नीचे कैसे होती जाती हैं
लहर तो है, पर वो दिखाई नहीं पड़ती
कभी कभी कंकड़ की आवाज भी सुनाई नहीं पड़ती,
पर असर तो है, एक कशिश सी है, इस बंधन में
एक पत्थर जोर से उछाल कर देखो मित्रों,
देखो, पानी ऊपर तक छलक आएगा
जानते हो ऐसा क्यों, होता है ये या होगा?
क्यूंकि तालाब शांत है, ठहरा है ,
एक बार इन जल्कुम्भियों को तो हटाओ
तुम खुद जान जाओगे कि, यह कितना गहरा है ।
19 Feb, 2005
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