Sunday, October 12, 2014

मेरा चेहरा एक शख्स से मिलता है

मेरा चेहरा एक शख्स से काफी मिलता है
मगर वो  शख्स दिन में सैकड़ो बार बदलता है
कभी कुछ पग आगे, कभी उलट रखता है
कभी निर्भीक खड़ा घोर वर्षा में नहाता है
कभी मंद घटाओं को देख ही राह से मुड़ जाता है
नित्य नए इरादे बनता है,  स्वपन्  सजाता है
और मंजिल को राहों में उलझा हुआ पाता  है
फिर इरादो के खंडहर में घूम घूम रह जाता है

वो  शख्स दिन में सैकड़ो बार बदलता है
बदलता वह स्वयं ही है, परन्तु,
दूसरों को बदला हुआ बताता है
अंतःकरण के छोर ढूढ़ता रह जाता है
मन की संकरी गलियां बहुत कुछ लील जाती हैं
हर पल उसका एक बदला हुआ रूप लेकर आती है
कभी वो हँसता है, कभी मात्र मुस्कुराता है
कभी व्यथा सागर में डूबता उतराता है
बदले मनोभावो से, चेहरा तक बदल जाता है
 
वो  शख्स दिन में सैकड़ो बार बदलता है
कभी प्रेम तो कभी प्रेमालाप करता है
कभी कठिनाइयों से लड़ता है और झगड़ता है
कभी ईर्ष्या, कभी क्रोध, कभी दृढ़ता है
कभी झूठा आवेश है, कहीं मंजिल से भेंट है
उस शख्स का हर भाव, अभाव का परिचायक है
ईच्छा, अभाव उसके अंतःकरण के नायक हैं
वो शख्स रंगमंच के हर किरदार को निभाता है
कभी कुछ तो कभी कुछ और बन कर आता है

वो  शख्स दिन में सैकड़ो बार बदलता है
वो छलिया ही, स्वयं को की छलता है
अपनी हर एक  विजय पर उछलता है
अपनी पराजय पर, नए बहाने गड़ता है
सोचता कुछ और है, होता कुछ और ही है
मन निरंकुश हर पल बदलत रहता है

वो  शख्स दिन में सैकड़ो बार बदलता है
पर बड़ी विचित्र मेरी व्यथा है ;
उस चेहरे के अनेको शख्स है -
हर पल, मेरे साथ  ही रहते हैं
उठते, बैठते, संग खाते, संग सोते हैं
वह सब एक दूसरों के पूरक हैं
फिर भी आपस में उलझ उलझ रह जाते है
उस शख़्स की शख्शियत को और विषम बनाते है



Saturday, October 11, 2014

जल्कुम्भियों वाला तालाब

जल्कुम्भियां तालाब में होकर भी,
तालाब का रंग नहीं हुआ करती है,
उसी पानी में होकर भी 
उस पानी से अलग हैं, जुदा हैं ।

वो देखने में हरी  होती हैं
उसमे नीले नीले फूल भी आते हैं
पर वो पानी का अक्स नहीं हुआ करतीं ।

लोग जल्कुम्भियों को देखते हैं,
नीचे ढके सैलाब को नही,
न मालूम कितनी गहराई है,
कितना जीवन भरा है उसमे,
कौन - कौन सी तरंगे उठकर,
यों ही उस आवरण में खो जाती हैँ
शायद ही कभी कोई दिखाई पड़े
जयादातर, अक्सर उसी में दफन हो जाती हैं ।

पर जल्कुम्भिया उस तालाब की पहचान हैं
लोग, उसे इसी झूठेपन से पहचानते हैं,
इसी झूठ को ही, तालाब का शिया मानते हैं,
कहते हैं, देखा हैं जल्कुम्भियों वाला तालाब;
गहरायी गुम हो गई, आवरण में अपने आप ।

उस तालाब की दशा भी असमंजस भरी हैं,
कभी उसे अपनी इस पहचान पर ख़ुशी है,
कभी इच्छा होती है, कोई उसे भी कुरेदे,
उसके अंदर झांके, और वृहद्ता को देखे,
ये जाने की तालाब शांत होकर, भी शांत नहीं है ।

कभी वो डरता है, कोई उसकी -
गन्दगी, मैलेपन पर नजर न डाल  दे,
उसे बुरा, गन्दा समझ जुदा न कर दे,
वो डरता है, कि उसकी कितनी बदनामी होगी,
उफ्फ कितनी भयावह परेशानी  होगी ।

इसी दर से वह, कभी भी इन-
जल्कुम्भियों को डूबने नहीं देता है
वह इन्हे पालता है, जिन्दा रखता है
अपनी ही असलियत की कीमत पर,
क्या करे गन्दा होकर भी, गन्दगी स डरता है ।

कभी खुद ही सोचता है, खुद से कहता है
कहीं ठहरे पानी में भी लहर उठा करती है
लहरें तो समंदर और दरिया में हुआ करती हैं
और तालाब कोई समंदर, कोई दरिया तो नहीं ।

दरिआ और समंदर में अनेकोनेक लहरें हैं
कितनी लहरें उठती हैं, गिरती हैं -
एक दूसरे में गुम होकर रह जाती हैं
पर तालाब, हाँ एक कंकड़ तो फेंको
देखो जल्कुम्भियां कैसे हिलती हैं
ऊपर, नीचे कैसे होती जाती हैं
लहर तो है, पर वो दिखाई नहीं पड़ती
कभी कभी कंकड़ की आवाज भी सुनाई नहीं पड़ती,
पर असर तो है, एक कशिश सी है, इस बंधन में

एक पत्थर जोर से उछाल कर देखो मित्रों,
देखो, पानी ऊपर तक छलक आएगा
जानते हो ऐसा क्यों, होता है ये या होगा?

क्यूंकि तालाब शांत है, ठहरा है ,
एक बार इन जल्कुम्भियों को तो हटाओ
तुम खुद जान जाओगे कि, यह कितना गहरा है ।


19 Feb, 2005







Friday, March 14, 2014

Optimist

main ek rahi hoon
mujhe door bahut hai jana
aanjani ankahe manjalian
hai un sabko mujhe pana

main ek sailab hoon
mujhko hai bas behte jana
tod kar har parvat pathar
nit naye raste banana

main dil ki awaaj hoon
mujhe hai man manthan karna
paat kar nafrat ki khai
prem ka mandir banana

main samadar ki lehar hoon
mujhe hai gahrai se uthna
nikal kar moti madik
jagat ko saundhrya badhana

main surya ki nav kiran hoon
muje hai andhere ko mitana
cheer kar kali raat ko
nit naya savera lana

main mera aaj hoon
mujhe hai bhavisya ko sajana
jo kal hua so hua
aage behter viswa banana

Monday, February 3, 2014

Always be young

There was a day, when i was born.
Here I am, still moving along,
In the time, wriggling like river
slowing, pacing and something racing.

A lesson every moment was learned,
Many forgotten, many made into crystals.
The house of cards, the very building,
I keep making, every moment, who i am.

The flow of gorgeous spawning life.
The state of sorrow, that sometime come.
The challenges that it throws now and then,
Its my life, which made me who I am.

No complaints, I owe to none,
No grudge, in this heart, may come.
Hey me, let me wander like a child,
Let me learn, I am still too young.